Shahid Naqvi

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कितना साकार हुआ स्‍वच्‍छ भारत का सपना

Posted On: 1 Oct, 2015 Others में

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आज का दिन राष्‍ट्रपिता को याद करने का एक अवसर प्रदान करता है । मोहनदास करमचन्‍द गांधी एक समूचे दर्शन का नाम है, जिसकी ओर दुनियाभर में असंख्‍य लोग आकर्षित हुए। हिंसा और मानव निर्मित घृणा से ग्रस्‍त दुनिया में महात्‍मा गाँधी आज भी सद्भावना और शांति के नायक के रूप में अडिग खड़े हैं और भी दिलचस्‍प बात यह है कि गाँधी जी अपने जीवनकाल के दौरान शांति के अगुवा बनकर उभरे तथा आज भी विवादों को हल करने के लिए अपनी अहिंसा की विचार-धारा से वे मानवता को आश्‍चर्य में डालते हैं।यह आश्‍चर्यजनक है कि उनकी विचारधारा की सफलता का जादू आज भी जारी है। आज तमाम लोग गांधीवाद का नारा बुलंद करतें मिल जायेंगें लेकिन ज़मीनी हकीकत मे उनके लिये गांधीवाद की प्रासंगिकता केवल खादी पहन्‍ने तक ही सीमित है ।आज़ादी के बाद से भारत मे एक दर्जन से अधिक प्रधानमंत्री हुये, जिनमे कई बड़े नाम भी थे , लेकिन शांति के इस मसीहा के सपनों का भारत धरातल के आसपास भी नज़र नही आता ।हर साल गांधी जयंती पर गांधीवाद पर बात होती तो होती है लेकिन अमल की नौबत नही आती है ।आजकल तो कुछ संघटन शांति के इस मसीहा को सवालों के घेरे मे भी खड़ा कर देतें हैं ।
गांधी के सपनों के भारत मे स्वच्छ भारत भी था । करीब 100 साल पहले महात्मा गांधी ने भारत में अपने पहले सार्वजनिक भाषण मे गंदगी का जिक्र किया था । 6 फरवरी सन 1916 को उन्‍होने वराणसी मे दिये अपने इस भाषण मे आस्‍था नगरी की गंदगी का जिक्र करते हुये स्वच्छ भारत की वकालत की थी ।आज सौ साल बाद भी इस मामलें मे शिव की नगरी काशी के हालात बहुत नही बदलें हैं ।जबकि वहां के प्रतिनिधि खुद प्रधानमंत्री हैं ।बहरहाल आज़ादी के 67 साल बाद एक साल पहले पहलीबार लाल किले की प्राचीर से किसी प्रधानमंत्री ने गंदगी के खिलाफ आवाज उठाई। लाल किले से दिये अपने भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत का नारा दिया था ।दो अक्टूबर सन 2014 को यानी गांधी जयंति के दिन स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत हुई। प्रधानमंत्री खुद हाथ में झाड़ू लेकर लोगों को साफ सफाई का संदेश देने निकल पड़े।सफाई अभियान में मोदी का साथ देने उनके मंत्रिमंडल के साथी निकल पड़े। प्रधानमंत्री ने वाराणसी के अस्सी घाट की गंदगी को साफ करने के लिए फावड़ा चलाया था । करीब एक साल बाद कितना साफ हुआ भारत , इसका सटीक आंकलन थोड़ा मुश्‍किल है ।लेकिन देश की राजधानी दिल्‍ली की तस्‍वीर मे तो बदलाव दिखता है ।रेल्‍वे स्‍टेशन से लेकर हर वह जगह जहां सार्वजनिक आवाजाही रहती है, एक साल मे कुछ बदला – बदला दिखता है ।लेकिन राजधानी दिल्‍ली की तस्‍वीर से देश के सुदूर इलाकों की हालत का मिलान नही किया जा सकता है ।केन्‍द्र सरकार के शहरी विकास मंत्रालय ने पूरे एक साल देश भर के 476 शहरों की साफ-सफाई का जायजा लिया । ये पता करने की कोशिश की कि सफाई के मामले में किस शहर को कितना सफर तय करना है । सर्वे के मुताबिक साफ सफाई के मामले में टॉप पर है कर्नाटक का मैसूर और इसके अलावा कर्नाटक के तीन और शहरों ने भी टॉप टेन में जगह पाई है ।सनद रहे कि दक्ष्‍िण भारत पहले से ही हर मामले मे जागरूक रहा है ।इस लिये दिल्‍ली या दक्ष्‍िण के कुछ शहरों को देख कर ये नही कहा जा सकता कि स्वच्छ भारत अभियान करोड़ों के प्रचार के बाद भी परवान चढ़ रहा है ।बिहार ,उत्‍तर प्रदेश , उड़िसा ,मध्‍य प्रदेश ,राजस्‍थान जैसे राज्‍यों के तमाम शहरों यहां तक कि वाराणसी के हालात भी जस के तस हैं। अस्पताल के बाहर कूड़े का ढेर, स्कूल के बाहर गंदगी का अम्बार, सरकारी दफ्तर के बाहर कचरे का जमावड़ा, बजबजाती नालियां, गन्दगी से पटी सड़कें, दीवारों पर पान की पीक और गली मोहल्लों में घूमते आवारा जानवर ,आज भी यही देश के तमाम शहरों की तस्वीर है ।नगर निगम से लेकर नगर पालिकाओं तक संसाधनों का अभाव है ।छोटे शहरों मे तो कई दिन तक कूड़ा नही उठने की शिकायतें आम है ।बड़ी नदियों आज भी प्रति दिन करोड़ों लीटर गंदगी समा रही है ।हां चित्रकूट जैसे पवित्र स्‍थलों पर जरूर कुछ जागरूकता दिखती है ।सरकारी अफसरों सहित आम नागरिक मंदाकनी को साफ करने और रखने मे आगे बढ़े हैं ।
इसी तरह देश भर के स्कूलों खास कर के सरकारी स्‍कूलों मे छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शौचालय की दरकार लम्‍बे अरसे से है ।क्‍यों कि छात्राओं के स्‍कूल छोड़ने की एक वजह सरकारी प्राइमरी और जूनियर स्‍कूलों मे शौचालय का ना होना भी बताया जाता है । प्रधानमंत्री ने सभी स्कूलों में लड़के और लड़कियों के लिए अलग शौचालय बनाने की बात की और देश को यह भरोसा दिलाया कि वह इस लक्ष्य को जल्द से जल्द पूरा भी कर लेंगे। जाहिर है कि यह उनकी संवेदनशीलता और देश के शहरी वा ग्रामीण इलाकों की समझ को दर्शाता है । पर सालभर बीत जाने के बाद भी परिस्थितियों में कोई खास बदलाव नहीं आया है। हां, इस बारे में थोड़ी हलचल तो है लेकिन यह केवल बात के स्तर पर ही देखी जा सकती है। इस बारे में हकीकत में कुछ खास होता हुआ नहीं दिखता।कागज़ और आंकड़ों मे ज़रूर लक्ष्‍य के नज़दीक पहु्ंचना बताया जा रहा है ।, स्वच्छ विद्यालय का लक्ष्य देश के सभी स्कूलों में पानी, साफ-सफाई और स्वास्थ्य सुविधाओं का पुख्ता इंतजाम रखा गया है ।ये अभियान सेकेंडरी स्कूलों में लड़कियों की एक बड़ी आबादी को रोकने में अहम भूमिका निभा सकता है।एक आंकड़े के अनुसार देश में 3.83 लाख घरेलू और लगभग 17,411 सामुदायिक शौचालयों का निर्माण हुआ लेकिन बीते साल कितने स्कूलों में शौचालयों का निर्माण हुआ, इसका जवाब न सरकारी विभागों के पास है और न ही किसी सामाजिक संगठन के पास ।सरकार के मुताबिक अभी देश के दो लाख स्‍कूलों मे शौचालय नही है ।
फिलहाल मानव संसाधन विकास मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, 2012.13 में देश के 69 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था थी जबकि 2009.10 में यह 59 प्रतिशत थी । 2013.14 में हालांकि करीब 80.57 प्रतिशत प्राथमिक स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय की व्यवस्था है । स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पन्द्रह अगस्त को ऐतिहासिक लाल किले की प्राचीर से सांसदों और कारपोरेट क्षेत्र से अगले साल तक देश भर के स्कूलों में शौचालय, विशेषकर लड़कियों के लिए अलग शौचालयों के निर्माण में मदद करने की अपील की थी ।लेकिन फिलहाल देश के करीब 38 प्रतिशत स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं है। हालांकि, 95 प्रतिशत स्कूलों में पेयजल सुविधा उपलब्ध है।देश के स्‍कूलों मे 62 फीसदी स्‍कूलों मे शौचालयें होने का दावा जरूर किया जा रहा है लेकिन ये आंकड़े दस्तावेजों में ही सही दिखतें हैं ।कई ऐजेन्‍सियों के सर्वेक्षण के अनुसार, जिन स्कूलों में शौचालय हैं, उनमें से अधिकांश बंद या जाम पड़े हैं। ये शौचालय इस्तेमाल में लाने योग्य नहीं हैं और तमाम खस्ताहाल हैं।उत्‍तर भारत के कई राज्य में यह दावा किया जाता है कि 96 फीसदी शौचालय इस्तेमाल योग्य हैं। अगर हालात छोड़कर इन तथ्यों पर भरोसा किया जाए तो फिर राज्य के ग्रामीण इलाकों में लड़कियां पढ़ाई बीच में ही क्यों छोड़कर चली जाती हैं?शहरी इलाकों मे हालात गांव जितने खराब नही है । दूसरी बात, अगर इन शौचालयों में से अधिकतर बुरे हाल में हैं तो इसका अर्थ यह है कि राज्य सरकार शौचालयों के रख-रखाव के लिए बजट मुहैया नहीं कराती। ग्रामीण इलाकों के स्कूलों में शौचालयों में पानी की अनुपलब्धता बड़ी चिंता का विषय है ।
स्वच्छ भारत अभियान की सफलता या असफलता का रास्‍ता ग्रामीण भारत से ही हो कर जाता है ।सनद रहे कि देश मे इससे पहले भी स्वच्छ भारत अभियान चला था ।सन 1986 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने केंद्रीय ग्रामीण स्वच्छता कार्यक्रम की शुरुआत की थी। 1999 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे थोड़ी ऊंचाई देते हुए पूर्ण स्वच्छता अभियान का नाम दिया। मोदी सरकार ने इसका पुनर्निर्माण करते हुए फ्लश सिस्टम वाले शौचालयों पर ध्यान केंद्रित किया और खुले में शौच बंद करने और मानव द्वारा मल उठाने पर रोक लगाने की बात की थी। इसके अलावा ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और पर्यावरण के प्रति जागरूकता लाने की भी बात शुरू की गई।दरअसल नये र्निमाण मे तो सरकारी और गैर सरकारी दोनो स्‍तर पर रूची ली जाती है ।लेकिन पहले से बने शौचालयों के रख-रखाव में कोई दिलचस्पी नहीं दिखती ।इसी लिये तमाम राज्‍य सरकारें वास्तव में स्कूलों के शौचालय के लिए बजट मुहैया कराने में बहुत कंजूसी दिखाती हैं ।यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्र के स्‍कूलों मे बड़ी संख्‍या मे शौचालयों मे ताला मिलने की शिकायतें आती हैं ।वास्‍तव मे भारत को स्वच्छ बनाने के लिए बहुत बड़े बदलाव की दरकार है।पूरी व्‍यवस्‍था को बदलने के जमीनी तौर पर जरूरत है ।बड़ी सामान्‍य सी बात है कि जब जब घरों के शौचालयों के गड्ढे सूख जाते हैं या फिर चेंबर पूरी तरह भर जाते हैं तो ऐसे हाल में फंड की कमी समस्याओं को और ज्यादा बढ़ा देती है ।तो स्कूल के शौचालय भी इन्हीं दिक्कतों से ज्‍यादा जूझ रहे हैं ।स्‍थानिय स्‍तर पर किसी भी मद से पैसे का बंदोबस्‍त होना बड़ा मुश्‍किल होता है ।
सरकार का दावा है कि आगामी चार साल में स्वच्छता अभियान के तहत 52 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे । कंपनी अधिनियम 2013 में सुधार करके कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के जरिये स्वच्छ भारत कोष तैयार किया गया है । जिसके जरिये एकत्रित किए गए धन से ढ़ाई लाख से अधिक शौचालयों का रख-रखाव किया जाएगा ।हांलाकि इस पूरे हालात के लिये अकेले प्रधानमंत्री को कठघरे मे खड़ा नही किया जा सकता है।राज्‍य सरकारें और जिम्‍मेदार अमला इसके लिये ज्‍़यादा दोषी नजर आता है।पीएम मोदी की तो इसके लिये तारीफ की जानी चाहिए कि बापू के सपनों को साकार करने के लिये उन्‍होने एक आवाज़ दी है । बहरहाल प्रधानमंत्री अब ज़रूर इस बात को महसूस कर रहे होंगे कि स्वच्छ भारत कहना और सपना देखना तो आसान था पर पूरा करना कठिन है।लेकिन तमाम देशवासियों को ये जानने के लिए 2019 तक इंतजार करना होगा कि स्वच्छ भारत अभियान एक ठोस पहल था या कि केवल राजनीतिक वादा और नेताओं का गुब्बारा था? यानी इस मामले मे भी अभी देश को लम्‍बा सफर तय करना है ।
** शाहिद नकवी **

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
01/10/2015

श्री नकवी जी विस्तार से स्वच्छता विषय को लेकर लिखा गया बहुत अच्छा लेख |लेकिन सफाई तभी संभव है जब हम जागरूक हों |

Shahid Naqvi के द्वारा
03/10/2015

शोभा मैम हौसला बढ़ाने के लिये आपका आभार ।आप से माफी चाहता हूं कि मै आपका लेख नही पढ़ पाता हूं लेकिन आपका आर्शिवाद मुझे बराबर मिलता रहता है।जी आप सही कह रही हैं।वैसे काफी जाकरूकता आयी है।मुझे सबसेज्‍़यादा तबखलता है जब लाेग यात्रा के दौरान रेल की सीटों पर जूते रख कर चढ़ते हैं।नदियों की सफाई पहले जरूरी है।मै ट्रीटमेंट प्‍लांट पर देखता हूं कि विभाग और कम्‍पनी के लोग अपनी बचत करने केलिये अक्‍सर पम्‍प बंद कर देते हैं।

Jitendra Mathur के द्वारा
03/10/2015

आपके विचार तार्किक और उपयोगी हैं जिन पर सभी को ध्यान देना चाहिए । केवल हाथ में झाड़ू लेकर तस्वीर खिंचवाने और उसे जहाँ-तहाँ पोस्ट करके झूठा प्रचार करने से भारत स्वच्छ नहीं होगा । इसके लिए सही दृष्टि चाहिए जिसका मुख्य बिन्दु है अपशिष्ट-प्रबंधन की सही योजना । और चाहिए जनता में वास्तविक जागरूकता जो वही नेता ला सकते हैं जो कि महात्मा गाँधी कि तरह सही मायनों में आगे होकर नेतृत्व करें और आमजन को सही मार्ग दिखाते हुए उस पर आगे बढ़ाएं ।  खोखले नारों और सतही बातों से यह होने वाला नहीं । इतने अच्छे लेख के लिए आपको साधुवाद ।

Shahid Naqvi के द्वारा
03/10/2015

जितेन्‍द्र माथुर जी आपका तहेदिल से आभार ।बेहद अफसोस की बात है कि इतने बदलावों के बाद भी हम आज भी अपना ही सोचते हैं ।मसलन मोहल्‍ले की गली मे अगर पानी भर रहा है तो लोग स्‍थाई निदान के बजाय उस जगह को उूचा्ं कर देगें ।ये नही सोचते कि दूसरे पड़ोसी के सामने गड्रढ।हो जायेगा ।हमे सब का सोचना होगा और अमल भी करना होगा ।इस कारण मुझे कई बार परेशानी का भी सामना करना पड़ता है।

jlsingh के द्वारा
05/10/2015

बहरहाल प्रधानमंत्री अब ज़रूर इस बात को महसूस कर रहे होंगे कि स्वच्छ भारत कहना और सपना देखना तो आसान था पर पूरा करना कठिन है।लेकिन तमाम देशवासियों को ये जानने के लिए 2019 तक इंतजार करना होगा कि स्वच्छ भारत अभियान एक ठोस पहल था या कि केवल राजनीतिक वादा और नेताओं का गुब्बारा था? यानी इस मामले मे भी अभी देश को लम्‍बा सफर तय करना है । बिलकुल सही फरमाया है आदरणीय नकवी साहब! प्रधान मंत्री दवरा नामित ज्यादा व्यक्ति भी फोटो सेशन तक ही सीमित रहे. बाकी जनता और सरकार को मिलकर कदम बढ़ाना हॉग!.

Madan Mohan saxena के द्वारा
05/10/2015

बहुत सुन्दर और सार्थक रचना बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती हुयी कभी इधर भी पधारें

Shahid Naqvi के द्वारा
05/10/2015

jlsingh साहब आपका आभार ।आज भी मै ऐसी ही एक बैठक मे गया था वहां भी बात केवल प्रचार प्रसार तक ही रही ।गांव के स्‍कूल मे नियुक्‍त सफाई कर्मी असल मे सफाई कर्मी नही हे।प्रधान के रिश्‍तेदार थे इस लिये नियुक्‍त हो गये ।वह खुद तो ये काम कर ही नही सकते हैं । तब कैसे स्‍कूल मे सफाई रहेगी । अरबों डालर भी खर्च क्‍यो ना हो जाये।

Shahid Naqvi के द्वारा
05/10/2015

Madan Mohan saxena जी आप का आभार ।

yamunapathak के द्वारा
05/10/2015

श्री नकवी जी आप के ब्लॉग की बात सच है और मैं आदरणीय शोभा जी की बातों से सहमत हूँ कि अगर कहीं कोई चूक है तो उसके लिए हम जनता जिम्मेदार हैं .हम सब जिस कॉलोनी में रहते हैं अगर उसे ही साफ़ सुथरा रखने में मदद करें ,कचरा पेटी का इस्तेमाल करें तो भी स्वच्छता की तरफ एक कदम का नारा सार्थक हो जाए .दरअसल स्वच्छता की तरफ एक कदम नारा न होकर प्रत्येक कदम होना चाहिए तभी प्रतिबद्धता हो पाएगी .जब जन जन इसे समझे . साभार

Deepak Kapoor के द्वारा
05/10/2015

Dear Shahid Naqvi ji, ये आपने सही कहा की पहली बार किसी पी एम् ने लालकिले की प्राचीर से स्वच्छता के लिए आवाज़ उठाई है, भले ही एक साल में कुछ खास फर्क न पड़ा हो पर यदि अभियान पूरी तेजी से चलता रहा तो शीघ्र ही इसका परिणाम आएगा । Thanks Deepak Kapoor http://www.superawakening.com

Shahid Naqvi के द्वारा
07/10/2015

दीपक जी मेरा मनना है कि अरलोचना के लिये केवल आलोचना नही होनी चाहिये ।सफाई अभियान तभी सफल होगा जब जिम्‍मेदार लोग जमीनी हकिकत को समझने की कोशिश करेगें ।सरकारी स्‍कूलों के मामले मे तो बाद के लिये बजट देना होगा ।गांव वालों को ये समझना होगा कि अब स्‍कूलों के शौचालयों को अपने घर का समझ कर साफ करना होगा ।ये कैसी देश भक्‍ति है कि गावं वाले स्‍कूलों के दरवाजे तोड़ डालतें हैं ।पंखें इस लिये प्रधान के घरों मे रखें हैं कि वह गांव वाले उठा ले जायेगें । इस लिये केवल प्रचार या घन से बात नही बनेगी । दीपक जी आपका आभार ।

Shahid Naqvi के द्वारा
07/10/2015

यमुना मैेम आप सही कह रही हैं ।जब तक सब का साथ नही मिलेगा तब तक कामयाबी नही मिलेगी ।लेकिन हमारे यहां लोग सरकार की तरफ ताकते हैं लेकिन खुद को नही बदलते। देश प्रेम या देश भक्‍ति केवल मज़हबी मामलों मे ही दिखाते हैं ।


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