Shahid Naqvi

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21वीं सदी की भाजपा कैसे जह करेगी विवरदित मुद्दे

Posted On: 19 Oct, 2015 Others में

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भाजपा में नरेन्द्र मोदी-अमित शाह के युग को करीब डेढ़ बरस बीत गये हैं
।अब भाजपा के मायने मोदी और अमित शाह के हो गया है ।राजनीतिक पंडितों का
मानना है कि अटलबिहारी और लालकृष्‍ण आडवानी अपने दौर मे जितने ताकतवर थे
,ये दोनो उससे भी ज्‍़यादा ताकतवर हैं ।बदलते दौर की भारतीय राजनीति मे
एक नीति सी बन गयी है कि सत्‍ता सम्‍भालने वाले शक्‍स की पूरी तरह से
पार्टी पर भी कमान होनी चाहिए । संघ ने इसी बात को ध्यान में रख कर मोदी
समर्थक और मोदी की वैचारिक संस्कृति में रचे-बसे और स्थापित हुए अमित शाह
को अध्यक्ष बनाने पर सहमति दी थी ।इसी लिये अटल और मोदी सरकार के बीच का
फर्क शीशे की तरह से साफ दिख रहा है ।मोदी-शाह युग मे वैचारिक दृढ़ता भी
सख्त है और कैडर आधारित संरचना भी जीवित है । भाजपा की संरचना की असली
बुनियाद एकात्मक मानववाद ,अधिनायकवाद-व्यक्तिवाद पर भी विकास के नारों और
सबका साथ वा सबका विकास के जुमले के बीच भी कोई संकट नही है ।इसी लिये
उदारता की बात तो होती है लेकिन उसका वातावरण नही बनपाता है या बनने नही
दिया जाता है ।शायद यही वजह है कि अब कांग्रेस के दौर की तुष्टिकरण की
राजनीति पर सवाल ना उठ कर धारा 370, समान नागरिक संहिता और राम मंदिर
जैसे मुद्देां पर खुल कर बात की जाने लगी है ।यानी मोदी-शाह युग की कसौटी
पर हिन्दुत्व भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है।
सनद रहे कि पिछले लोकसभा चुनाव प्रचार के
दौरान नरेन्द्र मोदी ने समान नागरिक संहिता व राम मंदिर निर्माण के सवाल
पर कुछ नहीं बोला था पर धारा 370 के औचित्य पर उन्होंने जरूर सवाल खड़ा
किया था , बल्‍कि धारा 370 को जम्मू-कश्मीर के विकास में बाधक बताया
था।पिछले डेढ़ साल मे इन प्रश्‍नों को हल करने की कवायद नही हुयी लेकिन
जैसे ही उत्‍तर भारत के अहम राज्‍यों मे चुनावी मौसम आया ये सवाल फिर उठ
खड़े हुये हैं ।बिहार मे विधान सभ चुनाव चल रहें हैं तो उत्‍तर प्रदेश भी
चुनावी दहलीज़ पर खड़ा है । इनमे से एक समान नागरिक संहिता पर तो भाजपा
और संघ को अदालत का साथ भी मिल गया है और इसे अमल मे लाने के दोष से बचने
का रास्‍ता भी मिल गया है ।लेकिन धारा 370 पर अदालत के एक अत्यंत
महत्वपूर्ण फैसले ने भाजपा की सियासत को बड़ा झटका दे दिया है।
जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय ने कहा है कि राज्य को विशेष दर्जा प्रदान
करने वाले अनुच्छेद 370 ने संविधान में स्थायी जगह हासिल कर ली है और यह
संशोधन, हटाने या रद्द किए जाने से परे है। अदालत ने यह भी कहा कि
अनुच्छेद 35ए जम्मू-कश्मीर में लागू मौजूदा कानूनों को संरक्षण प्रदान
करता है। न्यायमूर्ति हसनैन मसूदी और न्यायमूर्ति राज कोटवाल की खंडपीठ
ने अपने 60 पृष्ठों के फैसले में कहा, ‘‘‘अस्थायी प्रावधान’ के शीषर्क के
तौर पर और पैरा 21 में अस्थायी, पर्विनकारी एवं विशेष उपबंधों’ के शीषर्क
से शामिल किया गया अनुच्छेद 370 संविधान में स्थायी जगह ले चुका है।इस
अनुच्छेद को संशोधित नहीं किया जा सकता , हटाया नहीं जा सकता या रद्द
नहीं किया जा सकता क्योंकि देश की संविधान सभा ने , उसे भंग किए जाने से
पहले इस अनुच्छेद को संशोधित करने या हटाये जाने की अनुशंसा नहीं की थी ।
राज्य के लिए उसको मिली सीमित संप्रभुता के साथ उसका विशेष दर्जा बना हुआ
है। उच्च न्यायालय ने कहा कि जम्मू-कश्मीर ने भारत के अधिराज्य को
स्वीकार करते हुए सीमित संप्रभुता हासिल की और दूसरी रियासतों की तरह
भारत के अधिराज्य के साथ उसका विलय नहीं हुआ।
भाजपा अपने जन्म काल से ही धारा 370 हटाने को लेकर
संघर्श करती आयी है और इस धारा को राष्‍ट्र की एकता व अखंडता के लिए बाधा
मानती रही है।हांलाकि इस मसले पर कानून मंत्री सदानंद गौड़ा ने सधी हुयी
प्रतिक्रिया दी है उन्होंने कहा कि अभी आदेश को पढ़ा नहीं है और संबंधित
अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल से लॉ मिनिस्ट्री को उसकी एक कॉपी मुहैया कराने
के लिए कहा गया है।लेकिन दूसरी तरफ जम्‍मू कश्‍मीर हाई कोर्ट के फैसले को
लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुडे़ जम्मू-कश्मीर स्टडी केंद्र ने
फैसले पर सवाल उठाए हैं। भगवा संगठनों और सूबे में अनुच्छेद 370 का विरोध
करने वालों को लगता है कि हाईकोर्ट के इस फैसले ने उनकी बहस को मजबूत
किया है।कुछ नेताओं ने कहा है कि अनुच्छेद 370 पर पार्टी की विचारधारा
में कोई बदलाव नहीं हुआ है। अनुच्छेद हटाने के लिए जम्मू कश्मीर विधानसभा
में दो-तिहाई बहुमत की जरूरत है। भाजपा के पास वह नहीं है। पीडीपी के साथ
गठबंधन सरकार विकास के एजेंडे पर बनाई गई है।ऐसा लगता है कि इससे
अनुच्छेद 370 को लेकर कानूनी बहस तेज होगी। संघ परिवार पहले से ही इसे
कानूनी खामियों का पुलिंदा करार देता रहा है। संभावना जताई जा रही है कि
मामला जल्द ही सुप्रीम कोर्ट पहुंचेगा।जम्मू कश्मीर स्टडी केंद्र के
अध्यक्ष जवाहर कौल ने कहा है कि अनुच्छेद 370 की आड़ में सूबे के
अनुसूचित जाति के लोगों को आरक्षण से महरूम रखा जा रहा है। अनुच्छेद 370
के मामले में जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट का फैसला संविधान के अनुच्छेद 16 की
धारा 4अ का उल्लंघन है। कौल ने इंदिरा साहनी बनाम भारत गणराज्य के 1992
के फैसले का हवाला देते हुए कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 16 की धारा 4अ
के तहत देश के सभी राज्यों से नौकरी में अनुसूचित जाति और जनजाति के
लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था करने की बात कही गई है। उन्होंने कहा कि
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 370 कानून के पालन को लेकर है। यह विधायी
कार्यों पर रोक के लिए नहीं है।उनका मत है कि संविधान के अनुच्छेद 368 के
तहत संसद को यह अधिकार है कि वह कानून में बदलाव कर सकता है। स्टेट लीगल
एड कमेटी के कार्यकारी चेयरमैन प्रो. भीम सिंह ने भी इस फैसले को
सुप्रीमकोर्ट में चुनौती देने की बात कही है । प्रो. भीम सिंह ने कहा कि
यह मामला देश के संविधान का है और इस पर देश की संसद ही विचार कर सकती
है।
उधर सुप्रीम कोर्ट के केंद्र से ये पूछते ही क्या वह एक समान
नागरिक संहिता लाने को तैयार है ? संविधान के अनुच्छेद 44 यानी समान
सिविल संहिता की चर्चा शुरू हो गई है । संविधान निर्माण के समय अनुच्छेद
44 में समान सिविल संहिता की बात हुई थी। संविधान निर्माता बाबा साहेब
अम्बेडकर ने कहा था, सिवाय विवाह तथा उत्तराधिकार नियमों के सभी कानून
समान हैं पर जो काफी दिनों से नहीं हुआ, उसे करने की इच्छा, अनुच्छेद,
(तब 35 अब 44) में है। अम्बेडकर ने यद्यपि सिर्फ विवाह और उत्तराधिकार
कानून की बात की थी पर इसमें सारे पर्सनल कानून आते हैं। पर्सनल लॉ की भी
अलग-अलग तरह से व्याख्‍या की गयी है। हिन्दू पर्सनल लॉ बौद्ध, सिख जैनों
पर लागू होता है जबकि मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत लॉ) उन मुसलमानों पर जो
जन्म से, धर्मातरण से मुसलमान हैं। ईसाइयों पर ईसाई कानून व पारसी समुदाय
के जो लोग धार्मिक तौर पर जोराष्ट्रियन हैं, पर पारसी धर्म कानून लागू
होता है। सभी धर्मो के कानूनों में विशिष्टताएं व अन्तर है।मिसाल के तौर
पर मुस्लिम कानून में पुरुष को कई पत्नियां रखने का हक है जबकि हिन्दू,
ईसाई व पारसी एक ही पत्नी रख सकते हैं। मुस्लिम लॉ में तलाक के लिए अदालत
जाने की जरूरत नहीं है जबकि बाकी धर्म कानून वाले अदालत में खास कारणों
से ही तलाक ले सकते हैं।
हर धर्म के वैवाहिक, पारिवारिक कानूनों में
काफी असमानताएं हैं।जिसके तुलनत्‍मक अध्‍यन से लोगों को लगता है कि कुछ
मजहब के कानून के स्त्रियों से भेदभाव करते हैं।उन्‍हे खासकर भाजपा, संघ
और उससे जुड़े संघटनों को सबसे अधिक भेदभाव मुस्‍लिम पर्सनल ला मे दिखता
है ।इसी लिये देश मे कॉमन सिविल कोड सियासी मुद्दा भी बन गया है ।कानून
मंत्री सदानंद गौड़ा कहते हैं कि राष्ट्रीय एकता के लिए समान नागरिक
संहिता जरूरी है लेकिन इसे लाने के लिए कोई भी निर्णय व्यापक विचार
विमर्श के बाद ही किया जा सकता है। उन्होंने कहा, हमारे संविधान की
प्रस्तावना और आर्टिकल 44 कहता है कि एक समान नागरिक संहिता होनी चाहिए।
राष्ट्रीय एकता के हित के लिए, निश्चित तौर पर एक समान नागरिक संहिता
संहिता जरूरी है ।यद्यपि यह बहुत ही संवेदनशील मुद्दा है। इस पर व्यापक
चर्चा की जरुरत है। यहां तक कि समुदायों में, पार्टी लाइन से ऊपर, यहां
तक कि विभिन्न संगठनों के बीच…. एक व्यापक चर्चा जरूरी है।राम मंदिर को
लेकर भी साधू संत और भाजपा से जुड़े कई संगठन आवाज बुलंद कर रहे हैं ।कुछ
संघटनों ने तो बाकायदा अपनी ओर से तारीख भी तय कर दी है । भाजपा देश की
राजनीति मे इन्‍ही मुद्दों को लेकर आगे बढ़ी है ।नब्‍बे के दशक मे लोकसभा
मे दो या तीन सीटों पर सीमित रहने वाली भाजपा आज ताकतवर और फैसला लेनें
वाली सरकार की बरगडोर थामे हैं।राम रथ और कमंडल की राजनीति को पीछे छोड़
कर आज 21वीं सदी मे भाजपा का कलेवर बदल गया है।उसमे अब केवल जनसंघी
,संघी ही नही हैं वरन वह दलबदल कर पहुंचे तमाम विचारधारा वाले नेताओं से
लैस है ।पार्टी का थिंक टेंक ये अच्‍छी तरह जानता है कि आज देश के हर
कोने मे जो कमल खिला है वह सबका साथ ,सबका विकास के बदौलत है । ऐसे
मे सरकार के कदम पर सभी की निगाहें लगी है ।
वैसे शायद ही किसी को संदेह हो कि इन
मुद्दों पर व्यापक विचार-विमर्श होना चाहिए, खासतौर पर उनमें, जिनका इस
फैसले पर बहुत कुछ दांव पर लगा है। हालांकि, सवाल यह है कि कुछ समुदाय के
पर्सनल कानून को हटाने के इस फैसले का कई तबकों की ओर से कड़ा विरोध हो
सकता है, जिसका देश के सामाजिक सौहार्द पर असर पड़ सकता है। क्या सरकार को
इस दिशा में आगे बढ़ने की कोई पहल करनी भी चाहिए? वह भी तब जब किसी तबके
के कल्याण की चिंता की बजाय इसमें लोगों को राजनीतिक दृष्टिकोण नजर आता
है। आमतौर पर यह समझा जाता है कि ऐसी किसी पहल का हिंदू समर्थन करेंगे,
जिससे सत्तारूढ़ दल को अपने पक्ष में बहुसंख्यक समुदाय के वोट लामबंद करने
में मदद मिलेगी।लेकिन इस मसले पर सीएसडीएस का एक सर्वे कुछ और ही कहता है
। सर्वे में 57 फीसदी लोग विवाह, तलाक, संपत्ति, गोद लेने और भरण-पोषण
जैसे मामलों में समुदायों को पृथक कानून की इजाजत के पक्ष में थे। सिर्फ
23 फीसदी लोगों ने समान नागरिक संहिता के पक्ष में राय जाहिर की। 20
फीसदी लोगों ने तो इस मुद्‌दे पर कोई राय ही जाहिर नहीं की। संपत्ति और
विवाह के मामले में समुदायों के अपने कानून रहने देने के पक्ष में 55
फीसदी हिंदुओं ने राय जाहिर की तो ऐसे मुस्‍लिम 65 फीसदी थे। अन्य
अल्पसंख्यक समुदायों ने सर्वे में इससे थोड़ी ज्यादा संख्या में इसे
समर्थन दिया। यानी अल्पसंख्यक समुदाय मौजूदा व्यवस्था कायम रखने के पक्ष
में हैं।ऐसे मे मोदी सरकार के लिये इन मुद्दों पर किसी एक रास्‍ते पर
बहुत दूर तक आगे बढ़ना आसान ना होगा । क्यों कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र
मोदी के स्वतंत्रता दिवस पर दिए भाषण से संगत होगा, जिसमें सामाजिक
सौहार्द पर अत्यधिक जोर दिया गया था?तो दूसरी तरफ हिन्दुत्व में विश्वास
रखने वाले कैडर व समर्थक यह कभी भी वर्दाशत नहीं करेंगे कि अटल बिहारी
वाजपेयी की तरह नरेन्द्र मोदी भी तुश्टिकरण की नीति पर चलें। चलें।लेकिन
ये भी ध्‍यान रखना चाहिये कि चमात्कार बार-बार नहीं होता है और मोदी
बार-बार चमत्कार नहीं कर सकते हैं।दक्षिण के राज्‍यों के अलावा दिल्‍ली
विधान सभा चुनावों मे इसकी बानगी दिख चुकी है ।जिस तरह अचानक फिज़ा मे ये
मुद्दे गूंजने लगे हैं उससे लोगों को शक हो रहा है कि कहीं इसका मकसद
जनता को चुनावी मौसम में मोदी के अच्छे दिनों के मज़ाक में बदलते नारे को
याद करने से रोकना और उन मुद्दों की तरफ से ध्यान भटकाना है तो नही हैं ।
**शाहिद नकवी**

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