Shahid Naqvi

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कश्मीर मे इतिहास रचने का सही अवसर

Posted On: 28 Mar, 2016 में

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जम्मू-कश्मीर की मुख्यधारा की राजनीति की निर्विवाद रूप से सबसे तेज नेता, पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की अध्यक्ष 56 वर्षीया महबूबा मुफ्ती आज उसी मुकाम पर हैं जिसकी आरजू उन्हें हमेशा रही है।भारतीय राजनीति की परम्परा के मुताबिक इस पर कभी कोई सवाल नहीं रहा कि उन्हें अपने पिता का उत्तराधिकार संभालना है।बेशक आज उनके लिए बड़ा सवाल यह नहीं है कि इस मुकाम पर वे कैसे पहुंचीं, बल्कि यह है कि किन हालात में पहुंची हैं।जम्मू में बीजेपी विधायक दल की बैठक में सरकार बनाने के लिए पीडीपी को समर्थन देने के बाद दोनो दलों ने राज्यपाल के समक्ष सरकार बनाने का दावा पेश किया है। राज्य की राजनीति ने जिस तरह फिलहाल करवट लिया है उसमे ये साफ है कि महबूबा मुफ्ती जल्दी ही जम्मू-कश्मीर की पहली महिला मुख्य मंत्री के रूप मे शपथ लेगीं।जबकि बीजेपी की ओर से डिप्टी सीएम के रूप मे निर्मल सिंह शपथ लेगें। ये भी तय है कि जम्मू कश्मीर में पुराने फॉर्मूले पर ही बीजेपी -पीडीपी सरकार बनेगी। अपने पिता और राजनैतिक गुरु के गुजर जाने के बाद यकीनन महबूबा के सामने भारी चुनौतियां हैं।अगर उन्हें अपने चुने हुए वक्त में मुख्यमंत्री का पद संभालना होता तो शायद यह काम आसान होता।अब अपने राजनीतिक जीवन के सबसे अहम पद पर कामयाब होने के लिए उन्हें संतुलन साधने का बड़ा मुश्किल काम भी करना होगा।दरअसल यह संतुलन उन्हें घाटी और जम्मू के बीच ही नही , श्रीनगर और दिल्ली के बीच भी साधना ही होगा।इसके अलावा पीडीपी के मुख्य रूप से मुस्लिम समर्थकों और बीजेपी के हिंदू समर्थकों के बीच भी ऐसे साधना होगा ,जैसे मुफ्ती मोहम्मद सईद ने साधने की कोशिश की थी।वह 2014 के विधानसभा चुनाव में पीडीपी के सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बाद बीजेपी से गठजोड़ करके जनादेश का सम्मान करने में कुछ हद तक कामयाब हुए थे। महबूबा के लिए यह सब कुछ इस लिये मुश्किल माना जा रहा है कि उनके पास प्रशासन या सरकार चलाने का भी कोई सीधा अनुभव नहीं है।इसके अलावा राज्य की सियासत मे सक्रिय पार्टियों से उनके रिश्तेा भी पिता की तरह के नही है ।
जम्मू-कश्मीर के सियासी फलक पर महबूबा का उभार उस दौर मे हुआ था जब 1996 में मुफ्ती साहब प्रदेश कांग्रेस के मुखिया थे और राज्य में राष्ट्रपति शासन के बेहद अशांत छह वर्षों के बाद कोई भी पार्टी के टिकट पर चुनाव लडऩे को तैयार नहीं था।लेकिन इस दौरान महबूबा अपने दम पर बिजबेहड़ा से चुनाव लड़ कर सियासी नेता के रूप में उभरीं।उनके राजनीतिक सफर के तीन साल बाद जब मुफ्ती ने कांग्रेस से अलग होने का फैसला किया तो महबूबा उनकी बगलगीर थी।उन्होंने नए सिरे से पार्टी को खड़ा करने में काफी मेहनत की।इस दौरान पिता और पुत्री में गजब का तालमेल था। मुफ्ती श्रीनगर में अपनी कश्मीर केंद्रित रणनीति तैयार करते रहे। जबकि महबूबा दिल्ली मे उनके लिए जमीन तैयार करती रहीं और पीडीपी में सबसे लोकप्रिय चेहरे के तौर पर उभरीं।साल 2002 में महज तीन साल पुरानी पीडीपी ने 16 विधानसभा सीटें जीत लीं और कांग्रेस के साथ मुख्यमंत्री पद के तीन साल के समझौते के तहत मुफ्ती की सरकार बनी। 2008 में महबूबा ने अपनी पार्टी के लिए 21 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की और अगले छह साल तक नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठजोड़ की सरकार के खिलाफ सक्रिय रह कर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के खिलाफ लोगों की नाराजगी भुनाती रहीं। आखिर 2014 के आमचुनावों में पीडीपी ने जब घाटी की सभी तीनों सीटें जीत लीं तो साफ हो गया कि महबूबा की मेहनत रंग ला रही है। सात महीने बाद विधानसभा चुनाव में पार्टी 28 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर लौटी और भाजपा के साथ पहली सरकार बनाई।हांलाकि ऐसे बेमेल समझौते की कोई उम्मीद नहीं कर रहा था।क्यों कि महबूबा की पहचान उन कश्मीरियों के नेता के रूप मे है जो भाजपा को मुस्लिम विरोधी पार्टी के रूप मे देखते हैं।वैसे अपने जीवनकाल मे मुफ्ती मोहम्महद ने और बाद मे महबूबा ने प्रधानमंत्री मोदी की जम कर तारीफ करके इस सोच को बदलने की भरसक कोशिश भी की है।कश्मीर जैसे रूढ़िवादी राज्य में एक महिला होते हुए महबूबा का सक्रिय राजनीति में होना अपने आपमें एक बड़ी बात है। बात सिर्फ इतनी सी नहीं है बल्कि राज्य व राष्ट्रीय राजनीतिक पटल पर भी महबूबा ने अपनी पार्टी का मजबूत प्रतिनिधित्व किया है। ऐसे में महबूबा से सीएम पद की कुर्सी संभालने से कहीं ज्यादा अपेक्षाएं रहेंगी। दरअसल यह रास्ता महबूबा के लिए कठिन और संघर्ष वाला है।इस गठबंधन में महबूबा को अपने पिता,जो कि राजनीति के एक दिग्गज थे की तरह कई सवाल सहने पड़ेंगे। वो मुफ़्ती ही थे जो गठबंधन सरकार के 10 महीनों में हुए कई हमलों को सह गये।मुफ़्ती मोहम्मद सईद ने जब भाजपा से हाथ मिलाया था तब उन्होंने कई सपनों को भी बुना था मगर 10 महीनों के इस गठबंधन सरकार के शासनकाल में उन सपनों को हकीकत का स्थान नहीं मिला।महबूबा यह भी जानती हैं कि पिछले दस महीनों के शासन में जम्मू कश्मीर में जो-जो मुद्दे उछले और उनपर राजनीति हुई चाहे वह अनुच्छेद 370 हो या बीफ या राज्य ध्वज उससे उसकी ज़मीन कश्मीर में हिल गई है।जानकारों का मानना है कि महबूबा के लिए बीजेपी और केंद्र से भी बड़ी चुनौती यह होगी कि कश्मीर घाटी और जम्मू के मुस्लिम बहुल इलाकों में अपनी पार्टी की साख को कैसे बहाल रखा जाए।दरअसल कुछ थोड़े-से लोग ही स्व. मुफ्ती के बतौर मुख्यमंत्री दूसरे कार्यकाल के दस महीनों को कामयाब मानेंगे।क्योंकि पुनर्वास और जम्मू, कश्मीर तथा लद्दाख के समान विकास के वादे अधूरे रह गए हैं।इसके जवाब मे महबूबा उल्टे यह दुखड़ा रोने लगीं कि उनके पिता के साथ भाजपा द्वारा अच्छा सलूक नहीं किया गया। उन्होंने यह भी कहा कि मुफ्ती साहब ने जो कुछ सोचकर भाजपा से गठजोड़ किया था, केंद्र सरकार से उन्हें वैसा प्रतिसाद नहीं मिला। लेकिन आखिर मरहूम मुफ्ती साहब ने सोचा क्या था? एजेंडा ऑफ अलायंस में कहा गया था कि दोनों सहयोगी दल जम्मू-कश्मीर को दिए विशेष दर्जे की रक्षा करेंगे, लेकिन ऐसा भाजपा की तरफ से व्यवहार में नहीं दिखा। सर्वोच्च अदालत में इस आशय की याचिका भी लगाई गई कि संविधान के अनुच्छेद 35ए को समाप्त कर दिया जाए जिससे अनुच्छेद 370 भी निष्प्रभावी हो जाए। जम्मू-कश्मीर राज्य के स्वतंत्र ध्वज पर भी विवाद हुआ। मुफ्ती चाहकर भी हुर्रियत कांफ्रेंस के नेताओं से बातचीत नहीं कर पाए। मसर्रत आलम को पुन: गिरफ्तार करने और अन्य अलगाववादी नेताओं को नजरबंद करने पर उन्हें बाध्य होना पड़ा। ना ही मुफ्ती को केंद्र से इतनी आर्थिक मदद मिली, जितनी कि उन्हें उम्मीद थी,खासतौर पर बाढ़ राहत के सिलसिले में।केंद्रीय ऊर्जा विभाग ने भी एनएचपीसी की बिजली परियोजनाओं को राज्य को सौंपे जाने से साफ इनकार कर दिया था।
इसके उलट देखा जाये तो भारतीय राजनीति का ये दस्तूंर रहा है कि विरासत तो हर वारिस को हासिल हो ही जाती है, उसे संभालना और कायम रखते हुए उसे आगे ले जाना बड़ा मुश्किल होता है।महबूबा मुफ्ती पर भी फिलहाल यही बात लागू होती है। महबूबा ने सियासत का पहला सबक उन्हीं मुफ्ती से सीखा जो राजनीति के एक ऐसे सांचे में फिट थे जिसकी केंद्र की सत्ता में काबिज नेताओं की हमेशा जरूरत रही।इसी जरूरत के चलते ही एक मार्च 2015 को सियासी विचारधारा के दो ध्रुवों कुछ मसलों पर एक मत हो सके।तब इसे भारतीय राजनीति की एक बड़ी घटना माना गया था।लेकिन अब बीजेपी और पीडीपी के बीच पुराने गठबंधन को दोबारा गढ़ने से लेकर उसे अंजाम देने तक कायम रखने में महबूबा की भूमिका कहीं से भी कम नहीं रही।इसके बावजूद महबूबा को अभी कड़े इम्तिहान से गुजरना होगा क्योंकि उनके सामने कई चुनौतियां साफ नजर आ रही हैं। मुफ्ती के रहते ही अगर महबूबा की ताजपोशी हो गई होती तो अलग बात होती। मिलजुल कर चुनौतियों को सुलझाना वैसे भी ज्यादा आसान होता है।महबूबा के सामने बीजेपी के साथ साथ गठबंधन में सहयोगी सज्जाद लोन के साथ भी राजनीतिक रिश्ता कायम रखना कोई छोटी चुनौती नहीं है।वहीं भाजपा के लिये भी महबूबा के साथ सरकार लम्बे समय तक चलाना किसी चुनौती से कम नही है।कश्मीार की सियासत मे दखल रखने वालों का तो यहां तक कहना है कि उनकी बहन रुबिया सईद और पिता मुफ्ती ने तो तब अलगाववादियों को शुक्रिया भर अदा किया था।लेकिन महबूबा तो उनके प्रति हमदर्दी और उनसे नजदीकी के लिए जानी जाती हैं।पहले अपने बयानों और कार्यप्रणाली को लेकर महबूबा अक्सर विवादों में भी रही हैं।फिर चाहे पीडीपी द्वारा जारी कश्मीर के नक्शे की बात हो,कश्मीरी पंडितों के मामले हों या फिर अमरनाथ यात्रा को लेकर उनका रवैय हो। इसके अलावा महबूबा की पिछली राजनीति भी भगवा परिवार में संदेह पैदा करती रही है।वह बतौर सीएम महबूबा घाटी मे अपना जनाधार और मजबूत करने की कोशिश करेगीं।जबकि भाजपा जम्मू क्षेत्र मे मिले अपार जनसर्मथन को किसी भी कीमत पर खोना नही चाहेगी।इस लिये जानकारों का मानना है कि बीजेपी को मुख्यमंत्री महबूबा से तालमेल बनाए रखना मुश्किल होगा।सच मे अगर महबूबा अपने पुराने राजनैतिक तेवरों यानी फायर ब्रांड पर लौटने की तैयारी करती हैं, जो 1999 में पीडीपी के गठन के समय से ही रहा है तो बीजेपी और केंद्र सरकार मौजूदा गठजोड़ को जारी रखने के बारे में पुनर्मूल्यांकन करने पर मजबूर हो सकती हैं।यानी कश्मीरियत और भारतीयता की यह साझा विरासत वह चुनौती है जो गठबंधन के दोनो दलों के सामने हैं।लेकिन कश्मीर मे इतिहास रचने का भी ये सही अवसर है। सियासी विचारधारा के दो ध्रुव एक राह पर चल कर बरसों से अलग माहौल मे जी रही कश्मीरी जनता को ये एहसास और भ्‍रोसा दिला सकतें हैं कि असल मे है सारे जहां से अच्छा है हिन्दुस्तां हमारा । बहरहाल इस समय तो महबूबा के इस बयान पर भरोसा करना चाहिये कि हमारी सरकार नए उत्साह के साथ मुफ्ती मोहम्मद सईद के सपनों को साकार करेगी।उसका पूरा जोर जम्मू-कश्मीर में शांति, सुलह और विकास पर होगा।भाजपा भी समस्या मिलकर सुलझा लेंने की बात कर रही है।
** शाहिद नकवी **

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