Shahid Naqvi

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कातिल मांझा से मझधार मे है लाखों परिवार की जिंदगी

Posted On: 20 Aug, 2016 में

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मेकइन इंडिया और र्स्टाटर अप इंडिया के नारों पर अब भी वैश्वीकरण हावी है।तभी तो आज भी भारतीय बाज़ार चाइनीज़ सामानों से भरा है।इसी लिये आसानी से मिल जाने वाला चाइनीज़ मांझा कातिल बन कर हम भारतीयों के जीवन की डोर काट रहा है।कस्बों से लेकर छोटे शहरों और देश की राजधानी तक ये मासूम बच्चों और पतंग के शौकीनों के साथ राहगीरों के लिये मुसीबत बन चुका है।इस मांझे से देश के उन हज़ारों परिवारों पर आर्थिक चपत भी लग रही है जो दशकों से मांझा कारोबार मे लगे हैं।उत्तर प्रदेश के बरैली मे ऐसे सैकड़ों परिवारों के सामने तो रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है। पंद्रह अगस्त को जब सारा देश आजादी पर्व की खुशियां मना रहा था तब चाइनीज़ मांझा देश की राजधानी सहित कई शहरों मे कहर बरपा रहा था। पंद्रह अगस्त की शाम दिल्ली के रानी बाग इलाके में नन्ही सांची गोयल अपने माता-पिता के साथ फिल्म देखकर लौट रही थी। वह कार की छत की से बाहर देख रही थी। हंसती-खिलखिलाती बच्ची अचानक मां की गोद में गिरी तो उसका गला कटा हुआ था।वहीं दिल्ली के ही तिलक नगर में जगतपुरी फ्लाइओवर के पास रूफविंडो से ही बाहर देख रहे चार साल के हैरी का गला भी चीनी मांझे ने रेत दिया। विकासपुरी में मोटरसाइकिल सवार 22 साल के जफर खान की मौत मांझे से गला कट जाने के कारण हुई। वहीं मोटरसाइकिल चला रहे एक पुलिस उपनिरीक्षक मांझा फंसने से बुरी तरह घायल हो गए।देश की राजधानी मे एक के बाद एक हुये चाइनीज़ मांझा हादसों ने सारे देश को हिला दिया है।खबरों के मुताबिक अकेले दिल्ली मे ही एक दिन मे इस मांझे की चपेट मे आ कर चार सौ के आसपास परिंदें भी ज़ख्मी हुये जिसमे से कई की बाद मे मौत हो गयी।राजधानी के अलवा देश के दूसरे शहरों इलाहाबाद, बनारस, जयपुर, बरैली, पटना और भोपाल आदि मे भी चाइनीज मांझा मौत का सबब बन चुका है।दिल्ली और राजस्थान हाई कोर्ट ने भी चीनी मांझे के इस्तेमाल और बिक्री को प्रतिबंधित कर दिया है।जबकि इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश के बाद यूपी सरकार ने भी पहले ही इसके उत्पादन, बिक्री और इस्तेमाल पर पूरे उत्तर प्रदेश में प्रतिबंध लगा दिए थे। महाराष्ट और आंध्र प्रदेश में भी इस किस्म के मांझे पर रोक है। कर्नाटक सरकार भी चीनी मांझे पर रोक लगा चुकी है। इतने उदाहरणों से ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि ये मांझा कितना खतरनाक है।लेकिन बड़ा सवाल ये है कि यूपी राजस्थान दिल्ली सहित दूसरे राज्यों मे ये प्रतिबंधित मांझा अब भी कैसे मिल रहा है।दरअसल इतने हादसों के बावजूद केन्द्र सरकार की ओर से अब तक इस दिशा मे कोई ठोस कदम नही उठाया गया हे।जबकि राष्ट्रीय स्तर पर इसे प्रतिबंधित कर देश मे इसके आयात पर ही अब तक रोक लग जानी चाहिये थी।हमारी नीतियों और विदेशों की हमारे प्रति नीतियों मे कितना अंतर है।भारत से विदेशों को र्नियात किये जाने वाले हर सामान की पहले हम खुद पड़ताल करतें हैं और फिर सम्बंधित देश भी कड़ी पड़ताल के बाद ही हमारे उत्पादों को अपने यहां आने की अनुमति देता है।हम कई बेगुनाहों की ज़िंदगी गवानें और अपने पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के बाद भी उस चीन के व्यापार समझौते का मान रख रहे हैं जो किसी ना किसी बहाने हमें नुकसान पहुंचाने की ताक मे रहता है।
हमारी राजनीतिक बिरादरी और उसकी कार्यप्राणाली को देखिये कि किसी मां की गोद तो किसी का सुहाग उजाड़ कर यह चाइनीज मांझा अब अपनी धार से दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच सियासी दांव पेंच की वजह भी बन गया है।दरअसल, दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल में इस बात को लेकर बहस छिड़ी है कि, इस पर रोक लगाने वाली फ़ाइल किसके दफ्तर में कितने समय तक अटकी रही और किसने कितनी जल्दी आगे बढ़ा दी। हैरानी तो इस बात की है कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया इस मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं तो जवाब में उपराज्यपाल नजीब जंग भी प्रेस रिलीज जारी कर देते हैं।दरअसल एलजी और दिल्ली सरकार की मंशा है कि पंद्रह अगस्त के हादसे क जिम्मेदार जनता सीधे उनको ना समझ बैठे इस लिये आरोप प्रत्यारोप का दौर चल रहा है।दिल्ली सरकार का आरोप है कि चीनी माझे पर प्रतिबंध लगाने की प्रक्रिया में 4 दिन राजनिवास व 7 दिन पर्यावरण विभाग ने बर्बाद कर दिए। इसके चलते अधिसूचना जारी करने में देरी हुई।दिल्ली मे प्रतिबंध की अधिसूचना 16 अगस्त को जारी हुई जबकि एक दिन पहले ही खूनी मांझा अपना तांडव दिखा कर चला गया। पतंगबाजी में सबसे ज़्यादा मजा पतंग काटने और पेंच लड़ाने में आता है। पेंच के लिए मजबूत मांझे की ज़रूरत होती है।अपने देश में मांझा सबसे ज़्यादा बरेली में बनता है जो पूरे देश में सप्लाई होता है। इन्हें बनाने वालों के नाम पर मांझे के रेट तय होते हैं जैसे जाफरी मांझा, रोहित मांझा, जिलानी मांझा आदि। ये मांझे 750 रुपये परेता से 2100 रुपये परेता तक होते हैं। जबकि पिछले 6 सालों से बाज़ार में चाइनीज मांझा आया जो दिल्ली से किलो के भाव आता है और इसका रेट भी बेहद सस्ता होता है। चाइनीज मांझा बेहद मजबूत होता है, मजबूती ऐसी कि किसी का भी गला काट दे। इसलिए इस मांझे की तेजी से मांग बढ़ी है।
सस्ते चाइनीज मांझे ने बरैली के 30 हजार और देश के करीब तीन लाख मांझा कारीगरों के लिये भी बड़ा आर्थिक संकट पैदा कर दिया है।एक जमाना था जब बरैली के मांझा कारीगरों की देश भर में धाक हुआ करती थी।लगता है अब मांझे को धारदार बनाते बनाते इनके हाथों से किस्मत की लकीरें ही कट गयीं।तेज़ चटख धूप में पूरे दिन कड़ी मेहनत करने के बाद भी अब महज सौ से डेढ़ सौ रुपए ही इनके हाथ आते हैं।इसके चलते वह पहले से ही गुरबत के शिकार थे,उस पर चाइनीज़ मांझे ने कारोबार की कमर तोड़कर रख दी है।यूं तो चीनी मंझा सबसे पहले 2008 में गुजरात में सुर्खियों में आया था जब मकर संक्रांति के दिन इसने बहुत से लोगों को घायल कर दिया था और ढेर सारे पक्षियों की जान ले ली थी।लेकिन एक रिपोर्ट के मुताबिक 2011 में चायनीज मांझा भारतीय बाजार में फैल गया, इसके पहुंचने के बाद बरेली के सूती मांझे के व्यापार पर बड़ा प्रभाव पड़ा।बरेली अपने मांझे के लिए भी देश मे जाना जाता है।बरेली का मांझा कारोबार करीब 200 साल पुराना है लेकिन अब अपने अस्तित्व के लिए जद्दोजहद कर रहा है।कहा जाता है कि बदहाली के दिनों में भी यह कारोबार हर महीने करोड़ों का टर्न ओवर देता था, लेकिन अब हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि महीने में एक करोड़ रुपए का आंकड़ा भी पार करना मुश्किल है। वजह साफ है कि चाइनीज़ माल ने बरेली के मांझे की चमक फीकी कर दी है। लिहाज़ा मांझे को धार देने वाले मांझा कारीगरों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया है।फोन पर बातचीत मे बरैली के मांझा कारीगरों ने कहा कि उनके बनाए सूती के मांझे की मांग इतनी कम हो गई है कि उनके इस पेशे में बना रहना मुश्किल होता जा रहा है। लॉन से बने नायलॉन का मांझा जब 2011 में आया तो यह हाथ से बने सूती मांझे से बेहद सस्ता था, इसलिए इसे लोग चायनीज मांझा कहने लगे।एक रिपोर्ट के मुताबिक, यह सूती से बने मांझे से अंदाजन 700 -800 रुपए सस्ता है। जहां सूत से बने मांझे के 12 रील की कीमत 1100 रुपए या इससे ज्यांदा है, वहीं चायनीज मांझे की 12 रील 300 रुपए तक की होती है। नायलॉन का होने से यह आसानी से नहीं टूटता। यह उस धागे की तरह है, जिसका इस्तेेमाल मछलियों को पकड़ने में होता है। धागे के ऊपर केमिकल की पर्त होती है, जो इसे मजबूत और धारदार बनाती है।जबकि बरैली और देश मे दूसरी जगह बनने वाल परंपरागत मांझा कच्चे सूती धागे पर लेप चढ़ा कर बनाया जाता है। लेप में सुहागा, नीला थोथा, लोहवान, चावल की लुग्दी, मांढ़, सरेस, प्राकृतिक रंग और ईसबगोल का प्रयोग होता है। वहीं चाइना का मांझा कच्चे सूती डोर की बजाए प्लास्टिक की डोरी से बनता है। इसमें नॉयलोन डोरी भी प्रयोग होती है। इसको धार देने के लिए लोहे और कांच के बुरादे के अलावा, खतरनाक केमिकल मिलाए जाते हैं। पतंग काटने के बाद जब चाइना मांझा खिंचता है तो लोहा और कांच की परत इसको धार देती है, जो भी इसके संपर्क में आता है यह उसको काट देती है।
बड़ा सवाल ये है कि हम मेकइन इंडिया के दौर मे हैं ,तब क्यों हमारा दो सौ साल पुराना कुटीर उद्दोंग बंद होने की कगार पर है और सरकारें अदालतों के र्निदेश ,मासूमों की ज़िंदगी गवाने के बाद भी सुस्ती से कदम उटा रही हैं।प्रधानमंत्री मोदी ने खुद पूर्व मे इस पर चिंता जाहिर की थी और कहा था कि मांझा कारीगरों को खाने के लाले पड़ गए हैं।उन्होंने गुजरात का हवाला देते हुये ये भी कहा था कि उनके कार्यकाल में गुजरात का पतंग कारोबार 35 करोड़ रुपये से बढ़कर 500 करोड़ रुपये का हो गया है।इसके बाद भी अब तक इस मामले मे केन्द्र सरकार ने दखल नही दिया और चुप्पी साधे है।आंकड़ों के मुताबिक देश में लगभग 125 करोड़ रुपये के मांझे का कारोबार होता है, जिसमें अकेले बरेली में 60 करोड़ रुपये वार्षिक कारोबार होता है।यही नही बरेली का हस्तनिर्मित मांझा ऐशिया के साथ यूरोप के कई देशों मे भी जाता है।इस विषय के जानकारों का कहना है कि जब तक देश भर में मंझे की खरीद-फरोख़्त पर पूरी तरह प्रतिबंध नही लगता तब तक इससे पूरी तरह बच पाना संभव नही है।इसके लिये जरूरी है कि केंद्र सरकार चीन से इस मंझे के आयात पर ही पूरी तरह रोक लगा दे और इसे प्रतिबंधित वस्तुओं की सूची में दर्ज़ कर दे।तभी स्वदेशी मांझा कारीगरों के हितों की रक्षा होगी और आये दिन होने वाले हादसे भी रूकेगें।
***शाहिद नकवी ***

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
22/08/2016

श्री शाहिद जी विस्तार से लिखा गया बहुत अच्छा लेख आज कल तो ख़ास अवसरों पर पतंग उड़ाई जाती है पहले पतंग का बहुत चलन था उंगलिये पर कट या खरोंचे आती थीं चायनीज मंझे के हम भी भुक्त भोगी हैं मैं और मेरे पति यमुना किनारे चौड़ी सड़क से स्कूटर पर जा रहे थे अचानक स्कूटर लड़खड़ाया रोकने पर देखा यह अमेरिकन फिल्ड कोट पहने थे जिस पर कैची भी नहीं चलती उसकी कॉलर तिरछी कटी हुई थी दूर एक पतंग पड़ी थी बस कोट नहीं होता गर्दन पर पड़ती यदि गले की दायीं तरफ की नस कट जाए बचना मुश्किल हैं चीन से मांझा मंगाने वालों पर रोक लगनी चाहिए रोक ही नहीं सजा मिलनी चाहिए

Shahid Naqvi के द्वारा
31/08/2016

शोभा मैम आज भी ये मांझा शहरों और कस्बों मे मिल रहा है । लेकिन बड़े पैमाने पर अब तक इस पवर रोक नही लग सकी है ।जब तक सीधे इसके आयात पर रोक नही लगेगी तब तक इसकी बिक्री बंद नही हेगी ।


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