Shahid Naqvi

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हिंदुस्तान की अवाम के दर्द को महसूस करे सरकार

Posted On: 20 Sep, 2016 में

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उरी हमले मे 17 जवानों की शहादत के बाद समूचा देश गुस्से में है। सरकार हो, विपक्ष हो या आम जनता सबने जवानों को श्रद्धांजलि दी और 17 जवानों की शहादत बेकार न जाने की बात कह रहे हैं। देश में चारों ओर भारी आक्रोष का माहौल है। देश की जनता पाकिस्तान को लेकर तनिक भी मौका देने के पक्ष में नहीं है। लुधियाना,जम्मू और उत्तर प्रदेश के कई शहरों में आक्रोषित लोगों ने मार्च निकाल पाकिस्तान के झंडे जलाए।लोग सवाल कर रहें हैं कि आखिर कब तक इस तरह हमारे जवान शहीद होते रहेगें। उरी में सेना के कैंप पर हुआ आतंकवादी हमला दिखाता है कि जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद का खतरा ज्यों का त्यों बरकरार है और पाकिस्तान अपने नापाक इरादों पर भी कायम है।इसी लिये ये बहुत बड़ा प्रश्न आज फिर खड़ा है कि पाकिस्तान आतंकवाद का शिकार है या फिर अन्य देशों, खासकर भारत में आतंकवाद के हथियार का प्रयोग करने वाला शातिर देश।कुछ दिनों पहले इसी तरह पुंछ के सैनिक शिविर पर भी हमला किया गया था, मगर उसमें कोई भारी नुकसान नहीं हुआ था। इस साल जनवरी में पठानकोट के वायुसेना अड्डे पर भी आतंकियों ने हमले किए थे, जिसमें सात जवानों की मौत हो गई थी। इन तमाम घटनाओं में पाकिस्तान में चल रहे आतंकी संगठनों के हाथ होने की पुष्टि हो चुकी है। उरी के जिस सैनिक ठिकाने पर ताजा हमला हुआ वह नियंत्रण रेखा से सटा हुआ है। वहां ऊंचे पहाड़ों, जंगल और दरिया की वजह से घुसपैठियों पर नजर रखना मुश्किल काम है।ताजा हमले की प्रकृति बताती है कि पाकिस्तानी सेना की मदद के बिना इस तरह का हमला संभव नहीं था। कश्मीर घाटी में पिछले करीब सत्तर दिनों से तनावपूर्ण माहौल है।सेना पर पत्थर बरसाने ,प्रर्दशन और झड़पों मे कई दर्जन जाने जा चुकी हैं।घाटी का ऐसा माहौल पाकिस्तान को हमेशा मुफीद जान पड़ता है और वह आतंकवादियों की घुसपैठ करा कर अपने मंसूबे को अंजाम देने की कोशिश करता है।लेकिन इस सवाल से फिर भी नही बचा जा सकता कि आतंकवादी कैसे सेना के कैंप में घुस गए और इतनी बड़ी क्षति पहुंचाने में सफल भी रहे।शायद सरकार इस बार भारी दवाब का अनुभव भी कर रही है।इसी लिये अब सरकार का भी साफ रूख है कि सैन्य रणनीतिक गतिविधियों में सेना को जरूरी अधिकार होने चाहिए है और वह देश की वाह्य सुरक्षा को लेकर अपनी रणनीति तैयार कर उसपर आगे बढ़े।सोमवार को नई दिल्ली मे शीर्ष सतरीय बैठक मे गहन विमर्श किया गया।सात रेसकोर्स मे सुरक्षा बैठक मे सेना ने हांलाकि पाकिस्तान को सैनिकों की शहादत का जवाब देने का जरूर एलान किया,लेकिन उसका तरीका नही बताया।उधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अंतरराष्ट्रीय मंचों से लगातार दोहराते रहे हैं कि पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा दे रहा है और उसे रोकने का हर प्रयास होना चाहिए। पिछले हफ्ते यह भी संकल्प दोहराया गया कि आतंकवादियों को मिलने वाली आर्थिक मदद के स्रोतों को खत्म करने की कोशिश की जाएगी।इन तमाम प्रयासों,अंतरराष्ट्रीय दबावों,सैनिक मुस्तैदी और अमेरिका के आंखें ततेरने के बावजूद पाकिस्तान पर कोई असर नहीं दिख रहा।वह अपने यहां संरक्षण पाए आतंकवादी संगठनों पर नकेल कसने को तैयार नहीं दिखता।तो क्या भारत को इससे निपटने के लिए अब भी किसी कारगर तरीके पर विचार करने की जरूरत नही?
अब इस मसले पर देश के सही फैसले पर पहुंचने का वक्त आ गया है क्यों कि वह अपने आतंकवादी संगठनों के जरिये एक अर्से से छद्म युद्ध छेड़े हुए है। यह युद्ध आजादी के बाद 1948 से चल रहा है। अंतर केवल यह है कि 1948 में पाकिस्तान के कबाइलियों ने हमला किया और 1965-1971 में सीधी लड़ाई पाकिस्तान के साथ हुई और भारतीय सेना ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया। पाकिस्तान दो भागों में बंट गया और जन्म हुआ बांगलादेश का।लेफ्टि.जनरल आमिर अबदुल्ला खान नियाजी समेत 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों को ढाका में भारतीय सेना ने बंदी बना लिया था।इसके बाद सेना के जवानों ने कारगिल संघर्ष में भी पाकिस्तानी घुसपैठियों को मार भगाया था।फिर भी पाकिस्तान नही माना और अपनी युद्ध नीति से लगातार भारत को आतंकवाद से परेशान कर रहा है या हमारी उदारता की परीक्षा ले रहा है।आंकड़े गवाह है कि 1991 से आज तक भारत मे 60 से अधिक आतंकवादी हमले हो चुके है जिसमे सन 2008 मे ही 14 हमले हुये। हम 1993 के मुम्बईै विस्फोट के बाद से आज तक केवल सबूत ही जूटा रहे है, और पाकिस्तान अंतराष्ट्रीय मंच पर हमारे ठोस सबूतों और अपनी भूमिका को नकारता रहा है।यही पाकिस्तान की रणनीति है जिसे वह बखूभी अंजाम दे रहा है।यही नही भारत ने सन 1972 से लें कर साल 2014 तक पाकिस्तान के साथ मतभेद खत्म करने के लिए महत्व्पूर्ण सक्रिय चेष्टा की हैं।लेकिन ये सभी प्रयास एक बार फिर नाकाम होते दिख रहे हैं क्योंकि पाकिस्तान फिर इनकार कर रहा है। उरी हमले मे एक बार फिर पाकिस्तान ने अपनी भूमिका को सिरे से नकारा है।देश से फिर सबूत मांग रहा है,लेकिन अब दुनिया इस सच्चाई को समझ रही है कि पाकिस्तान आतंकवादी देश की भूमिका में है।इसी लिये पूरी दुनिया में यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या पाकिस्तान में आतंकवाद कभी समाप्त होगा? इसका जवाब देना आसान नहीं। कम से कम निकट भविष्य में तो ऐसा कुछ होने वाला नहीं लगता। शांति किसे नहीं सुहाती, लेकिन मौत के कुछ सौदागरों को दुनिया का अमन चैन रास नहीं आ रहा। ये आतंक का दानव जब किसी देश को अपना निशाना बनाता है, तो उसकी निर्माता महाशक्तियां उसे धैर्य और शांति रखने का उपदेश देती नजर आती हैं, लेकिन जब बात अपने पर आती हैं, तो ये एकजुट होकर पूरी दुनिया से आतंक के रक्तबीज के संहार का आवाह्नन करते हैं।वैश्विक आतंकवाद के खिलाफ दुनिया की महाशक्तियों द्वारा चलाये जा रहे अभियान का यह विरोधाभास बड़ी विडम्बना है।अच्छे और बुरे आतंकवाद मे यहीं से अंतर शुरू हो जाता है। इंस्टिट्यूट फॉर इकोनॉमिकल एण्ड पीस द्वारा जारी वैश्विक आतंकवाद सूचकांक में आतंकवाद से प्रभावित शीर्ष दस देशों में भारत छठे स्थान पर है।
चाहे हाफिज सईद हो या दाऊद हो, इनको भारत को सौंपने की मांग को पाकिस्तान गंभीरता से नहीं लेता। इसलिए भारत को और कठोर कार्रवाई की आवश्यकता है।सुरक्षा की दीवार हम चाहे और सुदृढ़ कर दें, हो सकता है कि पाकिस्तान पर दुनिया का और दबाव बढ़े, लेकिन पाकिस्तान को सही रास्ते पर लाने के लिए भारत को अपने बलबूते पर ठीक रास्ते पर लाना होगा। अमेरिका भी अपना राष्ट्रहित देखकर कार्रवाई करता है, इसी प्रकार चाहे चीन पाकिस्तान की नीतियों का समर्थक हो, लेकिन उसके कूटनीतिक दबाव को कम करना होगा। चाहे कूटनीतिक एवं विदेशी दबाव की स्थिति में भी हमें जेहादी आतंक से निपटना होगा, यह भी कटु सच्चाई है कि पाकिस्तान द्वारा घुसपैठ कराकर हिंसा की साजिश पाकिस्तान की एजेन्सी आईएसआई करती है। अमेरिका, चीन को भी जानकारी है कि पाक काबिज कश्मीर में पाकिस्तान के द्वारा करीब पचास आतंकी कैम्प चलाये जा रहे हैं। इन कैम्पों को आईएसआई संचालित करती है। यह भी वास्तविकता है कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की बातों पर इसलिए भरोसा नहीं किया जा सकता है कि वहां की सेना सुरक्षा नीति निर्धारित करती है। जो लोकतांत्रिक ढंग से प्रधानमंत्री होता है, उसका केवल मुखौटा रहता है। यह भी कटु सत्य है कि पाक सेना भारत से दुश्मनी चाहती है।गौरतलब है कि भारत जैसे बड़े देश से पाकिस्तान की दुश्मनी का आधार, कश्मीर है।वह कश्मीर को अपना बनाना चाहता है लेकिन असलियत ये है कि आज वह इतिहास के उस मोड़ पर खडा है जहां से उसको कश्मीर पर कब्जा तो दूर , अपने चार राज्यों को बचा कर रख पाना ही टेढी खीर नज़र आ रही है। कश्मीर के मसले को जिंदा रखना पाकिस्तानी शासकों की मजबूरी हुआ करती थी लेकिन अब आतंकी संगठन पाकिस्तानी कब्जे से बाहर जा चुके हैं।अब आतंकवादियों को अगर कहीं से यह नज़र आता है कि पाकिस्तान की सरकार भारत के प्रति कहीं से नरम है तो वह पाकिस्तान को भी धमका देते हैं।
वहां के कट्टरपंथियों ने पाकिस्तान में भारत विरोधी भावना पैदा कर दी है। जुल्फिकार अली भुट्टो का तख्ता पलटने वाले जनरल जिया-उल-हक ने जबसे अपने शासनकाल में अपने राजनीतिक उद्देश्यों की सिध्दि के लिए पाकिस्तान को इस्लामीकरण की खुराक पिलाना आरंभ किया तबसे वहां कट्टरपंथी तत्वों को बल मिलना शुरू हो गया। इसके साथ ही पाकिस्तान का तालिबानीकरण होने लगा, मदरसों का जाल फैलने लगा। इनमें से अनेक मदरसों में आतंकवाद का प्रशिक्षण देने की शुरूआत हुई। बाकी कसर पाकिस्तान की पाठ्यपुस्तकों में इतिहास को तोड़-मरोड़कर पेश कर के कर दिया गया।वहां के मदरसे आतंकवाद की घुट्टी पिलातें हैं तभी तो परवेज़ मुर्शरफ ने कुछ के खिलाफ कार्यवाही की थी। यही कारण है कि वहां की आंतरिक स्थिति भी भारत के खिलाफ है। इसी घृणा और दुश्मनी के आधार पर ही भारत का विभाजन हुआ। अब भी इस स्थिति में विशेष बदलाव नहीं हुआ।उसने आतंकवादियों के माध्यम से परोक्ष युद्ध गत ढाई दशक से चला रखा है।पाकिस्तानी आतंकवाद और पाकिस्तान की दुश्मनी के निराकरण की स्थाई नीति क्या हो, इस बारे में उलझनें अधिक हैं।इसी लिये ये सवाल बार-बार उठता है कि एसी कौनसी परिस्थिति है कि हम पाकिस्तान के खिलाफ कड़े कदम नहीं उठा रहें हैं।भारत के नागरिक यह सवाल पूछ रहे है और उनमे आक्रोश है। आखिर क्यों हम विरोधियों का सर नही कुचल रहे। राजनीतिक हलके मे कहा जाता रहा है कि अभी तक भारत वही बोल रहा था जो 1947 में और उससे पूर्व अंग्रेज शासक उसके लिये निर्धारित कर गये थे। लेकिन नरेन्द्र मोदी के पीएम बनने के दो साल बाद एक बड़ा बदलाव दिखा कि भारत ने संयुक्त राष्ट्र में पहली बार बलूचिस्तान का मुद्दा उठाया है और पाकिस्तान पर वहां मानवाधिकारों के व्यापक उल्लंघन का आरोप लगाया है। बहरहाल सरकार को नवाज शरीफ की मृग तृष्णा पर भरोसा करके समय बर्बाद करने से कोई परिणाम नहीं निकल सकता।इसके लिए दृढ़ता के साथ कार्रवाई करना होगी और इस दिशा मे बरती जा रही झिझक को तोड़ना होगा ताकि पाकिस्तान के मंसूबों पर पानी फेरा जा सके।
*** शाहिद नकवी ***

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Dr shobha Bhardwaj के द्वारा
29/09/2016

 श्री नकवी साहब पाकिस्तान क बहुत बड़ा वर्ग है जो बुद्धिजीवी वर्ग है उसमें बहुत तडफ है भारत ने इतनी तरक्की की वह अभी भी पिछड़ गये उन्होंने ने ही अब तक अपने देश को बचाया है अब तो काफी समय बीत गया ऐसे पढ़े लिखे लोगों से बातें किये पाकिस्तान हाफिज सईद जैसे लोगों की राह पर चल पड़ा है उसमें बर्बादी ही बर्बादी है दोनों देश तरक्की करते अपने में ही एक शक्ति होते विवेचना पूर्ण लेख पहले लेख पढ़ा था परिस्थितियाँ कुछ और थी अब कुछ और शायद पाक हुक्मरान सम्भल जाएँ

Shahid Naqvi के द्वारा
02/10/2016

शोभा मैम ना जाने शसुरू से मुझे पाकिस्तान के लोंगों मे कोई दिलचस्पी नही रही । एक कारण ये था कि पहले जब भारत की क्रिकेट टीम वहां जाती थी तो बेईमानी से जावेद मियां दाद को एलबीडब्लू नही दिया जाता था ।


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