Shahid Naqvi

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अब आंखों को चुभता है मेड इन चाइना

Posted On: 6 Oct, 2016 में

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बीते एक पखवाड़े मे चीन और पाकिस्तान के साथ भारत के रिश्ते मे आयी खटास के बाद देशवासियों को मेड इन चाइना शब्द खटकने लगा है। पिछले कुछ वर्षों में ये शब्द भारतीयों की जरूरत बन गया कि लगभग हर तरह के इलेक्ट्रॉनिक ब्रांड पर मेड इन चाइना लिखा हुआ दिखता है। चीनी उत्पाद के लिए भारत बड़ा बाजार है। चीन के सस्ते इलेक्ट्रॉनिक आइटम भारत में तेजी से बिक रहे हैं।जिसके चलते भारत और चीन के बीच व्यापार के मामले में अब तक चीन का पलड़ा लगातार भारी रहा है।दूसरी ओर पाकिस्तान को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा मिलने के बाद वहां से भारत का व्यापार लगातार बढ़ा है।18 सितंबर को उरी में हुए आतंकी हमले के बाद से ही भारत सरकार पर पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा वापिस लेने का दबाव है।लेकिन सरकारी तौर पर अब तक इस बारे मे चीनी पटाखों को अवैघ करार देने के अलावा कोई खास पहल नही कि गयी है।लेकिन सरकारी खामोशी और सरहद पार से सामानों की आवाजाही के बीच पाकिस्तानी आतंकवाद का समर्थन करने की चीनी चुनौती को व्यापारी संगठनों और जनता ने स्वीकार किया है।विदेशी सामानों के बहिष्कार की प्रधानमंत्री की अपील के बाद तो देश के कई शहरों मे प्रर्दशन हुये हैं।जनता और विभिन्न संगठनों ने एकजुट होकर त्यौहारों के सीजन में चीन का सामान खरीदने और न बेचने का निर्णय लिया है।रेवाड़ी जैसे शहरों मे तो चाइनीज सामान की होली तक जलाई गयी।बिजली की चाइनीज लड़ियों और अन्य सामान को प्रतीकात्मक रूप से आग के हवाले किया।
दरअसल चीन दुनिया का सबसे बड़ा निर्यातक है जो अपने यहां बनाए आधे से ज्यादा माल का निर्यात करता है। करीब एक दशक पहले भारत के बाजार में चीनी उत्पादों की बाढ़ आई थी।इसके पीछे कमजोर युआन (चीन की मुद्रा), मूल्यों को प्रतिस्पर्धी बनाए रखने में सहयोग करने वाले थोक उत्पादन पर बल और भारत की अपनी उत्पादन क्षमताओं में कमियां जिम्मेदार थीं।सस्ता माल पाकर भारतीय काफी खुश हुए थे और धीरे-धीरे देश भर में चीनी सामान का ढेर लग गया।इसकी मार कमजोर देसी उत्पादकों पर पड़ी,कई छोटी भारतीय इकाइयों पर ताला पड़ गया। जबकि बड़ी इकाइयां अपने उत्पाद बनाने के लिए दूसरे ठौर तलाशने लगीं। चीनी निर्यात पर भारत की निर्भरता को सबसे बेहतर ऊर्जा क्षेत्र के उदाहरण से समझा जा सकता है।आज भारतीय परियोजनाओं के लिए करीब 80 फीसदी पावर प्लांट उपकरण चीन से मंगाए जा रहे हैं. अकेले ऊर्जा उत्पादकों को ही चीनी आयात की ताकत से रू-ब-रू नहीं होना पड़ा है बल्कि सिंचाई परियोजनाओं पर भी इसका असर पड़ा है। सिंचाई परियोजनाओं के लिये पीवीसी पाइपों की मांग लगातार बढ़ती जा रही है और चीन से आयात करने में आसानी हो रही है जो खासा सस्ता भी है।मिसाल के तौर पर मुंबई से सटे नावा शेवा बंदरगाह पर चीन से आने वाला एक टन पीवीसी पाइप 910 डॉलर का पड़ता है जबकि घरेलू उत्पाद की कीमत 1050 डॉलर है।ऑटो पार्ट्स एक और क्षेत्र है जिसे चीनी आयात की बाढ़ से देश के उत्पादकों कों संघर्ष करना पड़ रहा है।2013-14 में चीन से इंजन पिस्टन, ट्रांसमिशन ड्राइव, स्टीयरिंग और बॉडी कंपोनेंट का आयात कुल 2.6 अरब डॉलर रहा है और भारत में होने वाले ऑटो पार्ट्स आयात का 21 फीसदी रहा है। जिसने आयात के मामले में 15 फीसदी वाले जर्मनी को पीछे छोड़ दिया है।दूसरी ओर भारत ने सिर्फ 30 करोड़ डॉलर के पार्ट्स चीन को निर्यात किए।पूर्व यूपीए सरकार द्वारा घोषित राष्ट्रीय उत्पादन नीति हर साल उत्पादन क्षेत्र में 12 से 14 फीसदी वृद्धि पर केंद्रित थी।जिसमें दस करोड़ रोजगार का सृजन होना था और 2022 तक जिसे जीडीपी में 25 फीसदी हिस्सेदारी हासिल कर लेनी थी जो फिलहाल 15 फीसदी के आसपास है।यह प्रयास साकार नहीं हो सका,मोदी का मेक इन इंडिया अभियान चीन के मुकाबले बढ़ रही उत्पादन की इसी खाई को पाटने के उद्देश्य से लाया गया है।ताकि भारत को उत्पादन इकाइयां स्थापित करने के मामले में अव्वल बनाया जा सके।चुनौती यह है कि पिछले दस से पंद्रह वर्षों के बीच बाकी देशों ने प्रतिस्पर्धा में खुद को इस हद तक सुधारा है कि भारतीय कंपनियां न तो मूल्य में और न ही गुणवत्ता में उनका मुकाबला कर सकती हैं। 2014 के बाद चीनी कंपनियों को भारत में निवेश प्रतिबंधों में थोड़ी छूट दी गई है जिसका नतीजा है कि 2014-15 की तुलना में भारत में चीन का निवेश 6 गुना बढ़ गया है। एक रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में भारत में चीन का निवेश 87 करोड़ डॉलर है जो 2014 के निवेश के मुकाबले 6 गुना ज्यादा है।तमाम अर्थशास्त्री मानते हैं कि भारत-चीन व्यापार के मामले में चीन का पलड़ा भारी है। पर अब चीन के उत्पादों के प्रति देश में माहौल बदल रहा है।उरी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल समझौते पर दोबारा विचार करने की बात कही थी।इससे पाकिस्तान में हड़कंप मच गया,वहीं चीन ने चीन-भारत और बांग्लादेश में होकर बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी की सहायक नदी का पानी रोक दिया है।चीन के इस कदम से पूरा देश हैरान है।
इसके अलावा चीन ने भारत की एनएसजी सदस्यता और संयुक्त राष्ट्र में आतंकी मौलाना मसूद अजहर पर भारत के रुख का विरोध करते हुए वीटो किया है।इस पूरे घटना क्रम ने भारत और चीन के बीच एक बार फिर विवाद पैदा कर दिया है।देश में चीनी उत्पादों को लेकर तेजी से विरोध शुरु हो चुका है।सोशल मीडिया पर लाखों की तादात में लोगों ने चीनी सामान के बहिष्कार की बात कर हैं। दीपावली में चीन से बड़ी संख्या में पटाखे और लाइट्स डेकोरेश के उत्पाद आयात किए जाते हैं,अब लोगों ने दीपावली पर ऐसे समानों को न खरीदने की अपील की है। वास्तव में चीन का भारत के प्रति नजरिया हमेशा से दुश्मनी भरा रहा है।अतीत में गौर करें तो चीन भारत के खिलाफ सामान्यीकरण, सुधार, दोस्ताना संबंध नहीं रहे। कभी वीजा नत्थी करके देता है। कभी हुर्रियत नेताओं को आमंत्रण देता है। भारत के लोगों का वीजा अस्वीकार कर देता है। भारत के प्रधानमंत्रियों को अरुणाचल प्रदेश का दौरा न करने की चेतावनी देता है। दलाई लामा को कठघरे में खड़ा करता है।
चीन निरंतर हमारी सीमा में दखल देता है। हमारा रक्षा मंत्रालय लाचारी जताकर कह देता है कि सीमा निर्धारण न होने की वजह से ऐसा होता है। हम छिपाने की कोशिश करते हैं, चीन सिक्किम, लद्दाख में भारत पर दबाव बनाने की लगातार कोशिश करता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को तिरस्कृत करने की कोशिश करता है।लेकिन हमारी सरकारें अपनी विदेश नीति की कूटनीति के चलते बराबर इसे दूसरे तरीके से पेश काती रही।दाअसल देखा जाये तो देश के बुनियादी राष्ट्रीय हितों का टकराव चीन के साथ है, जो शायद कभी खत्म ही ना हो सके। जब चीनी राष्ट्रपति भारत आते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें साबरमती के किनारे झूला झुलाते हैं तो हमें ऐसा लगता है कि चीन का भारत के प्रति नजरिया बदल गया। चीन ने ऐसा दिखाया कि मोदी सशक्त नेता हैं और वह उनके साथ दोस्ताना रिश्ते रखेंगे।लेकिन हमसे भारी मुनाफा कमाने वाला चीन हमें झांसा देने में नहीं चूकता और हर मौके पर हमारे खिलाफ पाकिस्तान की ढ़ाल बन जाता हे।
जानकारों का मानना है कि हम चीन को लेकर पं. नेहरू से इंदिरा गांधी और मनमोहन सिंह तक गलतियां करते रहे हैं।नेपाल, म्यांमार, श्रीलंका या मालदीव के मामलों में भी चीन का प्रयत्न रहा है कि इन देशों में दखल देकर भारत के रास्तें मे कांटा बिछाया जाये ।यूं देखा जाये तो चीन के साथ हमारे संबंधों में वर्ष 1962 के बाद से ही दरार आ गई थी पर उसके बाद जब भी हमारे प्रतिनिधिमंडल वहां जाते हैं या व्यापारिक रिश्ते बढ़ते हैं तो लगता है कि रिश्ते सामान्य हो गए। लेकिन चीन का दुश्मनी भरा रवैया जारी रहता है। पाकिस्तान का उपयोग भारत के खिलाफ चीन वर्ष 1962 से करता आ रहा है। दोस्ती की ठोस पहल चीन की ओर से कभी नहीं हुई। उलटे भारत के लिए चीन चुनौती ही बन कर उभरा है।चीन नवरात्र और दीपावली पर ही लगभग तीन हजार करोड़ से ज्यादा का लतर यानी लाइटिंग् बल्व बेचता है।ऐसे में हम उसके सामानों की खरीददारी बन्द कर दे तो वह आर्थिक रूप से कमजोर हो जायेगा।दूसरी ओर पाकिस्तान है जिसको भारत ने मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा 1996 से दे रखा है।जिसके चलते पाकिस्तान को आयात-निर्यात में विशेष छूट तो मिलती ही है साथ ही में ये दर्जा होने से पाकिस्तान को कारोबार में सबसे कम आयात शुल्क देना होता है।अगर भारत पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा छीन लेता है तो पाकिस्तान काफी मुश्किल में पड़ सकता है।अगर भारत ऐसा करता है तो हो सकता है पाकिस्तान भारत के साथ व्यापार ही खत्म कर दे।अगर ऐसा हुआ तो थोड़ा नुकसान भारत को भी उठाना पड़ सकता है।लेंकिन सबसे बड़ा सवाल तो ये उठता है कि आज 20 सालों के बाद भी पाकिस्तान ने भारत को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा क्यों नही दिया है? ऐसा पाकिस्तान ने क्यों किया इस बात पर अभी तक खुलकर चर्चा नहीं हो पाई है।देश की सरकारों ने इस बावत पाकिस्तान पर दबाव क्यों नही बनाया।हम उसे दुलारते रहे,भारत के लागों की कमाई से वह भी मुनाफा कमाता रहा और हम अच्छे पड़ोसी का धर्म ही निभाते रहे।विश्व व्यापार संगठन में पाकिस्तान की ट्रेड पॉलिसी की समीक्षा पर प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान 2015 से भारत को नान डिसक्रेमेंट्री मार्केट का दर्जा देने की प्रक्रिया में है,लेकिन अब तक ये संभव नहीं हो पाया है। इस बात को लेकर कोई दो राय नहीं है कि पाकिस्तान और भारत के बीच काफी व्यापार होता है।एक जानकारी के मुतारबिक पाकिस्तान ने भारत से वर्ष 2016 में 782 मिलियन डॉलर का कॉटन, 184 मिलियन डॉलर के ऑर्गेनिक कैमिकल्स, 117 मिलियन डॉलर के प्लास्टिक और उससे बने प्रोडक्ट, 105 मिलियन डॉलर की सब्जियां और 104 मिलियन डॉलर के स्टेपल फाइबर खरीदे थे।तो वहीं भारत ने पाकिस्तान से वर्ष 2016 में 137 मिलियन डॉलर के मिनरल फ्यूल, 83 मिलियन डॉलर के फल, 74 मिलियन डॉलर का सिमेंट सॉल्ट, 40 मिलियन डॉलर का कॉटन और 14 मिलियन डॉलर के इनऑर्गेनिक कैमिकल्स खरीदे थे। भारत-पाक व्यापार को लेकर एक मजेदार बात ये भी है कि भारत इससे ज्यादा व्यापार तो अंगोला, चिली और तुर्की से करता है।अगर भारत पाकिस्तान के बीच व्यापार खत्म हो जाता है तो भारत को बहुत कम नुकसान होगा।जनता तो आक्रमक मूड मे है लेकिन फिलहाल मोदी सरकार ने एमएफएन पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।सर्जिकल स्ट्राइक के बाद ये सवाल बना है कि सरकार पाकिस्तान से मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा वापिस लेती है या नही।
** शाहिद नकवी **

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Dr shobha Bhardwaj के द्वारा
07/10/2016

श्री नकवी जी विस्तार से चीनी वस्तुओं के खिलाफ और उन लोगों के खिलाफ आपने लिखा है अति उत्तम कल मैनेजो चीनी वस्तुओं को प्रोत्साहन दे रहे हैं उपभोग करते हैं परन्तु वह प्रतिक्रिया दी थी परन्तु आपके ब्लॉग में नहीं है |

Shobha के द्वारा
12/10/2016

श्री नकवी जी आपने चीनी वस्तुओं के उपभोग के खिलाफ आवाज उठायी है काश हम समझें हम चीन में निर्यात कम आयात अधिक कर रहे हैं आजकल दिवाली आने वाली है बाजार में चीनी सामान भरे हुए हैं पहले लोग अपने एरिया में छोटी -छोटी दुकाने लगाते थे बिक्री होती थी हर घर में खुशहाली आती थी अब तो चीन में लक्ष्मी जातीं हैं दिए पूजा के कलेंडर लक्ष्मी गणेश भी चीन से आरहे हैं शर्म की बात है हमारे बिजनेस में वहाँ से सामान खरीद कर भारत भेज रहे हैं हमारी सरकार कुछ नहीं करती कई उद्योग बंद हो गये हमारा बाजार ,हमें ही चीन आँख दिखाता है |आपका लेख ध्यान से पढ़ा काश हम जान पाते हम चीनी सामान खरीद कर अपने ही कुटीर उद्योग बंद कर रहे हैं

Shahid Naqvi के द्वारा
15/10/2016

शोभा मैम हमे हरहाल मे चीनी वस्तुओं के उपभोग के खिलाफ आवाज उठानी ही चाहिये।हमे सस्ता का मोह छोड़ना चाहिये और आगे आ कर चीनी सामानों को नही खरीदना चाहिये ।


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